ना मैं धम्म जानती हुं
ना मैं मजहब जानती हुं
ना धर्म पता हैं
ना रिलिजन रखती हुं
जब से कुछ जाना हैं ऐ वतन मैं ने
तब से बस तिरंगे का इमान जानती हुं..
कुछ तो बात हैं उन तीन रंगों में
कुछ तो राज हैं इस के रुतबे में
हो खडी चाहे जहाँ में
नाम भी सुनु तो रूकना जानती हुं..
कुछ तो नशा होगा इस देस की मिट्टी में
युं ही नहीं वो शहीद हो गये
कभी याद भी करू उन को
तो सर झुकाना जानती हुं
मेरे वतन जानती हुं बस इतना ही मैं
के तुझ से बडा कोई दिलबर नहीं हैं मेरा
कभी मांग के तो देख मेरी जान
तेरे प्यार में कुरबान होना जानती हुं..
तेरे प्यार में कुरबान होना जानती हुं..
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